33वीं बार पीएम मोदी ने की ‘मन की बात’, वाजपेयी की कविता से कांग्रेस पर हमला

इमरजेंसी के दौरान अखबारों को बेकार कर दिया गया। 25 जून, 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के लिए काली रात थी। इमरजेंसी के दौरान अटलजी जेल में थे। उस रात को कोई भारतवासी, कोई लोकतंत्र प्रेमी भुला नहीं सकता। एक प्रकार से देश को जेलखाने में बदल दिया गया था। विरोधी स्वर को दबोच दिया गया था। जयप्रकाश नारायण सहित देश के गणमान्य नेताओं को जेलों में बंद कर दिया था। न्याय व्यवस्था भी आपातकाल के उस भयावह रूप की छाया से बच नहीं पाई थी। पीएम मोदी ने इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता भी पढ़ी, जो उन्होंने उस दौर में लिखी थी।
झुलासाता

शरद चांदनी उदास।
सिसकी भरते सावन का।
अंतर्घट रीत गया।
एक बरस बीत गया।
सींखचों में सिमटा जग,
किंतु विकल प्राण विहग।
धरती से अम्बर तक,
गूंज मुक्ति गीत गया।
एक बरस बीत गया।
पथ निहारते नयन,
गिनते दिन पल छिन।
लौट कभी आएगा,
मन का जो मीत गया।
एक बरस बीत गया।
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